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राज्यों में तीन साल की कमाई चाट जाएगा वेतन आयोग
jagran -- 08/18/2008 03:58 PM

नई दिल्ली [अंशुमान तिवारी]। राज्यों में पिछले तीन साल की कमाई अगले एक साल में गंवाई जा सकती है। राज्य अगर वेतन आयोग के मामले में केंद्र की तर्ज पर चलते हैं तो इससे बनने वाला राजकोषीय खर्च पिछले तीन साल की उपलब्धियों को निगल जाएगा। राज्यों में औसतन पिछले तीन साल खजाने के लिए अच्छे रहे हैं,लेकिन वेतन आयोग की दरियादिली इस कमाई को एक झटके में खत्म कर सकती है।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है पिछले तीन साल के दौरान राज्यों की बैलेंस शीट चमकाने में केंद्र की परोक्ष,लेकिन बड़ी भूमिका रही है। अगर अर्थव्यवस्था में कुछ ऊंच नीच हुआ और राजस्व के मामले में केंद्र की गणित डांवाडोल हुई तो राज्यों को खासी बड़ी मुश्किल झेलनी पड़ सकती है। बड़ी बात नहीं कि पिछले वेतन आयोग की तरह इस आयोग के बोझ से राज्यों को उबारने का ठीकरा भी केंद्र के ही सर फूटे।

पिछले तीन साल में राज्यों की वित्तीय स्थिति अप्रत्याशित तौर पर बेहतर रही है। राज्यों का राजस्व घाटा जो वर्ष 2003-04 में जीडीपी का 2.30 फीसदी था अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। ंवर्ष 2008-09 के बजट अनुमानों में राज्यों के खातों में सामूहिक तौर पर 0.5 फीसदी का आंशिक लेकिन सुखद सरप्लस नजर आ रहा है। राज्यों का राजकोषीय घाटा भी वर्ष 2003-04 की तुलना में 2.30 फीसदी घटकर चालू वर्ष में 2.1 फीसदी पर आ गया है। राज्यों का कुल राजस्व 2.3 फीसदी बढ़ा है और खर्च भी कम हुआ है।

यही वह एक वजह है कि जिसके चलते फिलहाल वेतन आयोग से राज्यों की वित्तीय स्थिति के लिए वैसा खतरा नहीं दिख रहा है जैसा कि पांचवे आयोग के समय नजर आया था। लेकिन जब सिफारिशें पूरी तरह अमल में आ जाएंगी तो बढ़ा हुआ खर्च सरप्लस और घाटे में कमी जैसी राजकोषीय उपलब्धियों को चाट जाएगा। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति भी इस बात से चिंतित नजर आ रही है। ताजी रिपोर्ट में उसने कहा है कि वेतन आयोग का बोझ अगले वित्त वर्ष में राज्यों की वित्तीय सेहत के लिए खतरा बन सकता है।

उल्लेखनीय पहलू यह है कि राज्यों की इस बेहतर वित्तीय तस्वीर में उनके श्रम का योगदान कम है। राज्यों को केंद्र से मिलने वाले संसाधन,राजस्व और अनुदान पिछले तीन साल में 1.6 फीसदी बढ़े हैं। केंद्र के राजस्व में पिछले तीन साल में 26 फीसदी की तेज वृद्धि रही है और इसमें प्रत्यक्ष कर संग्रह 30 फीसदी बढ़ा है। इसलिए राज्यों को केंद्र से मिलने वाला राजस्व भी बढ़ा है। इसकी तुलना में राज्यों का अपना राजस्व तीन साल में केवल 0.7 फीसदी बढ़ा है। यह वृद्धि भी वैट के अमल में आने के बाद हुई है।

खतरा यह है कि अगर अर्थव्यवस्था की विकास दर कम हुई और केंद्र के राजस्व संग्रह में वृद्धि की रफ्तार घटी तो राज्यों को केंद्र से मिलने वाला राजस्व भी घट जाएगा। उस स्थिति में वेतन आयोग के बढ़े खर्च और कम राजस्व के बीच राज्यों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था की गाड़ी चला पाना खासा मुश्किल हो सकता है।
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