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सेना जो हासिल करती है, राजनेता
गंवा देते हैं
jagran --
08/15/2008 02:38 PM
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नई दिल्ली [जरनैल सिंह]। 'सेना जब भी कुछ बढ़त हासिल करती है राजनेता उसे गंवा देते
हैं। चाहे 1965, 1971 की जंग हो या मौजूदा कश्मीर।' एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी का दबे
स्वर में यह कहना कश्मीर के हालात पर सेना के दर्द-ए-दिल को पूरी तरह बयां कर देता
है। अलगाववाद की आग में जल रही घाटी में पहली दफा वह स्थिति आई थी जब आतंकी हिंसा
का स्तर सबसे कम हो चुका था। लेकिन अब एक बार फिर नौजवान कंट्टरपंथियों के पीछे खड़ा
होता नजर आ रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि किस तरह 2001 में कश्मीर में 4507 लोग आतंकी हिंसा के शिकार हुए
थे। इनमें 1067 सामान्य नागरिक थे, 590 सशस्त्र जवान तो 2850 आतंकी। लेकिन 2007 में
स्थिति जबर्दस्त ढंग से सुधरी और केवल 777 लोगों की जानें गई जिनमें 164 सामान्य
नागरिक थे, 121 जवान और 492 आतंकी। 2008 में तो आतंकी हिंसा पिछले साल के भी मुकाबले
52 फीसदी कम हुई है। सेना को लग रहा था कि वह कश्मीर में हालात पर लगभग नियंत्रण
स्थापित कर चुकी है। पर्यटन फिर से बढ़ने लगा है और कंट्टरपंथी सैय्यद अली शाह
जिलानी का समर्थन कम हो रहा है। सेना की भर्ती रैली में दस हजार कश्मीरी युवकों का
आना सेना के लिए सुखद आश्चर्य था।
2002 के विधानसभा चुनाव में उससे पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले मतदान प्रतिशत बढ़ा
था। इस साल इसके और अधिक बढ़ने की उम्मीद थी। लेकिन अब जो हालात हैं उसमें तय समय
पर विधानसभा चुनाव कराए गए तो चुनाव बहिष्कार का आह्वान जबर्दस्त ढंग से सफल हो सकता
है। इनका मानना है कि सरकार व राजनीतिक दल मौजूदा अमरनाथ विवाद से कहीं बेहतर ढंग
से निपट सकते थे।
आपरेशन सद्भावना से हालात संभालने में जुटी सेना को लगता है कि 13 साल बाद पूरी घाटी
में कर्फ्यू लगना अच्छा संकेत नहीं है। खास कर शहरी इलाकों के बाहर भी असर दिखा है
जहां आतंकियों की पैठ कम होती जा रही थी। अगर पिछले साल घाटी से चार हजार अवैध
हथियारों की खेप पकड़ी गई तो उसके पीछे एक वजह स्थानीय लोगों से जानकारी मिलना भी
था। 2001 में हर रोज आतंकी हिंसा में 11 से 12 लोग शिकार बन रहे थे वह अनुपात इस
साल प्रति दिन 2 पर आ चुका था।
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